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किसान आंदोलन

क्या भारत का किसान इतना मूर्ख है कि कोई भी पॉलीटिकल पार्टी उसको अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर सकती है क्या किसानों की ज़रूरतों राज्यों की सरकारों के हिसाब से बदल जाती है  क्या किसान किसी समय विशेष को देख कर के आंदोलन करते हैं   क्या किसानों के मुद्दे वाकई इतनी जरूरी नहीं है कि वह समय-समय पर खत्म हो जाते हैं   क्या भारत का किसान इतना नासमझ है कि वह अपनी जरूरत से ज्यादा किसी पॉलिटिकल पार्टी के फायदे और नुकसान की बात करता है   भारत की राजनीतिक व्यवस्था यह मानकर चलती है कि किसानों को बरगलाया जा सकता है अपने फायदे के लिए काम में लिया जा सकता है   मीडिया जैसा चाहे किसानों के बारे में कुछ भी लिख सकता है किसानों को इससे कोई सरोकार नहीं आज की परिस्थिति आज आज की परिस्थिति में देखा जाए तो आपको यह देखकर हैरानी नहीं होगी कि यही सब हमारे न्यूज़ चैनल और लोगों को समझाने की कोशिश की जा रही है जो किसान आंदोलन हुआ है इतने बड़े पैमाने पर किसानों को इस बात से ऐतराज है कि जो व्यवस्था या नहीं अभी लाए हैं वह किसान विरोधी है लेकिन सत्तापक्ष को बरगलाने वाली राजनीति कहता है और विपक्ष इस को एक मौका लेकर चलता है

दोनों ही परिस्थितियों बेहद खतरनाक है क्योंकि इसमें किसी का भी फायदा होगा लेकिन भारत के किसानों का फायदा नहीं हो सकता और इसीलिए जमीनी तौर पर हमें यह समझना पड़ेगा कि किसान का आंदोलन या किसान की जरूरत है कहीं न कहीं सरकार सरकार समझने में नाकाम है इसीलिए बार-बार किसान सड़क पर उतरता है अपने काम धंधे को छोड़कर और अपने घर परिवार को छोड़कर सड़क पर आकर अपनी मांग रखने की कोशिश करता है जंतर मंतर दिल्ली में एक जगह बन गई है जहां पर आप आइए चाय पीजिए खड़े रहिए और एक हॉलीडे मना कर चले जाइए आप इस बात की नहीं है कि आप आकर आंदोलन करते हैं बात यह है कि क्या हम जमीनी स्तर पर कोई परिवर्तन ला सकते हैं जिसमें किसानों को सही मायने में क्षमा प्रदान की जाए क्योंकि भारत में खेती अभी तक मौसम के आधार पर चलती है और मौसम अगर पक्ष में नहीं है तो पूरी की पूरी फसल या पूरा का पूरा पूंजी बर्बाद हो जाता है

क्या भारत सरकार क्या भारत सरकार इसमें ऐसा कोई कदम नहीं उठा सकती इसमें किस को एक इंडस्ट्री का दर्जा दिया जाए और जिसकी भरपाई और नफे नुकसान का एक सही तरह से मेकैनिज्म बना करके इसकी सुरक्षा प्रदान की जाए ताकि यह सिर्फ मौसम के ऊपर आधारित होने वाली या कुछ इस तरह की बात ना होती किसान का आंदोलन एक राजनीति या किसी समय विशेष में किसी पार्लियामेंट के बिल पास होने पर कुछ टाइम की हलचल मचा कर रुक जाए

आप चाहे जान और हम चाहे खेती जानते हैं या नहीं लेकिन खाना हम तीन वक्त का सभी खाते हैं और इसीलिए इस बात को बहुत अधिक गहराई से लेने की जरूरत है कि भारत में कृषि में क्या समस्याएं हैं किसानों की क्या मुद्दे हैं और उनको किसी भी पार्टी के ऊपर उठकर के एक सामाजिक न्याय और मानवीय तरीके से इस को समझाया जाए भारत में खेती एक तरह का बहुत घाटे में रहने वाला सौदा है जिसे कोई करना नहीं चाहता लेकिन जिन लोगों के पास कोई और तरीका नहीं है वह इस पर निर्भर रहते हैं और उसके अलावा उन्हें मायूसी और दगाबाजी के अलावा कुछ भी नहीं मिलता किसान का मुद्दा एक महत्वपूर्ण मुद्दा है और उसको किसी भी सरकार को सुलझाना उसका दायित्व है

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