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बलि बकरे की दी जाती है शेर कि नहीं |डॉक्टर बाबासाहेब अंबेडकर

बाबासाहेब आंबेडकर समाज के संतुलन की बात करते हैं समाज में उन व्यक्तियों की उपस्थिति की बात करते हैं जिनको गिना नहीं गया और इसीलिए बाबा साहब का सबसे बड़ा जोड़ रहा कि रिप्रेजेंटेशन या प्रतिनिधित्व का मुद्दा सबसे ज्यादा जरूरी है जहां कहीं भी आपको परिवर्तन करना है अगर उसमें परिवर्तन के लिए व्यक्ति मौजूद नहीं है या उनका प्रतिनिधित्व नहीं है तो परिवर्तन संभव नहीं हो सकता और इसीलिए आपने देखा होगा कि जो शारीरिक रूप से लाचार है और शारीरिक रूप से जो किसी भी श्रेणी में नहीं गिने जाते हैं उनकी कहीं कोई बात नहीं होती उनके बारे में मकान बनाने वाले सड़क बनाने वाले क्या कोई भी नया मॉल खोलने वाले कभी नहीं सोचते क्योंकि उनकी संख्या कम होती है और उनके ना आने से कोई फर्क ही नहीं पड़ता लेकिन इससे आगे बढ़कर भी अंबेडकर ने बहुत बड़ी बात कही है और वह है कि बलि बकरे की दी जाती है शेर कि नहीं

 जब तक आप कमजोर रहेंगे लाचार रहेंगे और लोगों से सहायता मांगते रहेंगे तब तक कोई आपको नहीं पूछने वाला आपको लगता है कि आप रो कर भीख मांग कर लोगों  अपने पर दया करने पर मजबूर कर सकते हैं यह बिल्कुल गलत है आदमी उसी से डरता है जो आपके सामने ताकतवर खड़ा है और कभी भी कोई इंसान प्यार मोहब्बत से नहीं डरता डरता है आपसे इसीलिए जब लोग बलि देने की बात करते हैं तो बकरे को बड़ी आसानी से पकड़ कर काटा जा सकता है उसका विरोध करने वाला ना उसके पास नूर है ना उसके पास कोई दांत और ना ही उसके पास लेकिन शेर को काटना और उसको काट कर खाना बड़ा मुश्किल काम है क्योंकि आप को पकड़ने में ही आधी जिंदगी निकल जाएगी और अगर पकड़ लिया तो वह आपको छोड़ेगा नहीं वह आप को खा जाएगा इसीलिए जिंदगी में कभी कमजोर मत रहो तो आपके साथ बुरा करे उसको ऐसा जवाब दो कि वह जिंदगी भर याद रखें अपने हक की लड़ाई लड़ना और अपने वजूद को कायम रखना यह आपका कर्तव्य है कोई और आ कर रही करेगा और इसीलिए अंबेडकर ने अपनी जमात को ताकतवर बनाने के लिए कहा था बलि बकरे की दी जाती है शेर कि नहीं

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